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Bandar Review: जेलों और कानून व्यवस्था का काला सच दिखाती है Bobby Deol की दमदार फिल्म

By प्रदीप कुमार नई दिल्ली : 


बंदर: पिंजरे में क़ैद रहने को मजबूर आरोपी!

कलाकार: बॉबी देओल, सपना पब्बी, सान्या मल्होत्रा और सबा आज़ाद आदि

निर्देशक: अनुराग कश्यप

रेटिंग: 5/3* स्टार 

"बंदर" फिल्म हमारे समाज, कानून, थानों और जेलों की उस स्याह सच्चाई से रूबरू कराती है जिसमें बलात्कार के आरोपी को तुरंत दोषी मान लिया जाता है। ऐसे में दोषी सिद्ध होने से पहले ही उसे पल पल दोषी से भी बदतर मानसिक और शारीरिक यातना सहनी पड़ती है।

Bobby Deol स्टारर फिल्म Bandar का पोस्टर, जिसमें भारतीय जेल व्यवस्था, कानूनी संघर्ष और बेगुनाही की लड़ाई को दर्शाया गया है।

अभिनेता बॉबी देओल और निर्देशक अनुराग कश्यप की यह फिल्म भारत की त्रुटिपूर्ण जेल प्रणाली और कानूनी व्यवस्था की वास्तविक घटनाओं पर आधारित है। फिल्म के निर्माताओं ने वास्तविक दस्तावेजों और समाचार रिपोर्टों का इस्तेमाल किया है, जिसमें यह सामने आया कि भारतीय जेलों में बंद लगभग 77% कैदी केवल विचाराधीन होते हैं। ऐसे कई मामले हैं जहाँ लोग अपराध सिद्ध हुए बिना ही दशकों तक सलाखों के पीछे सड़ते रहते हैं।

यूं तो भारत की जेलों का बहुत बुरा हाल है। वहां सिर्फ हत्यारे, बड़े राजनीतिक क़ैदी और भ्रष्टाचारी ही सुरक्षित हैं। आम कैदियों को तो रोज़ मरना पड़ता है और उस नरक से निकलने की कोई उम्मीद नहीं होती। बलात्कार के आरोपी को जेल में सबसे निकृष्ट माना जाता है और उसके साथ क़ैदी भी बहुत बुरा बर्ताव करते हैं।

फिल्म की कहानी ‘समर’ (बॉबी देओल) के इर्द-गिर्द घूमती है। समर टीवी कलाकार है जिसका गिरता करियर और खोया हुआ स्टारडम उसकी मेंटल और प्रोफेशनल कमजोरी बन चुका है। समर अपनी जिंदगी को वापस पटरी पर लाने की कोशिश कर रहा है और अपनी पार्टनर खुशी के साथ रहने का सपना देख रहा है। लेकिन, कहानी तब बहुत कटु और डरावना मोड़ लेती है जब गायत्री (सपना पब्बी) के साथ पुराना रिश्ता उसके जी का जंजाल बन जाता है। गायत्री अचानक समर पर रेप का आरोप लगाती है। यहां से फिल्म समाज के क्रूर चेहरे को सामने लाती है। फिल्म साफ तौर पर दिखाती है कि कैसे सोशल मीडिया और आम जनता किसी व्यक्ति को दोषी साबित करने और कोर्ट के फैसले से पहले ही उसके पूरे वजूद को खत्म करने की साजिश कर सकते हैं। टूटे हुए आदमी का समाज, मेंटल ट्रॉमा और अपने अंदर के शैतानों के खिलाफ अपनी बेगुनाही साबित करने की लड़ाई, फिल्म का सबसे मजबूत इमोशनल पक्ष बनाती है। कसी हुई पटकथा दर्शकों को आखिर तक बांधे रखती है।

फिल्म में बॉबी देओल ने 'समर मेहरा' नाम के प्रौढ़ टेलीविजन स्टार का किरदार निभाया है, जिनका जीवन एक डेटिंग ऐप पर महिला से मित्रता और मुलाक़ात के बाद बलात्कार और नंगे फोटो के बदले पैसा मांगने के आरोप के बाद पूरी तरह से बर्बाद हो जाता है। बॉबी ने भयभीत, विवश और अपराधबोध के बावजूद खुद को निरपराध बताने वाले आरोपी की भूमिका अच्छी तरह निभाई है। यह फिल्म एनिमल और आश्रम के बाद उनके खाते में बड़ा सितारा साबित होगी।

फिल्म के अन्य कलाकारों ने भी अच्छा काम किया है। सपना पब्बी ने गायत्री का किरदार शानदार ढंग से निभाया है। अन्य कलाकारों का काम भी सराहनीय है। गीत संगीत पक्ष कमज़ोर है। अनुराग कश्यप ने बढ़िया निर्देशन किया है।

भारत की जेलों, थानों और कानून प्रणाली का काला सच देखना चाहते हैं और बॉबी देओल की शानदार एक्टिंग देखनी है तो यह फिल्म अवश्य देखनी चाहिए।

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