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अंतरिक्ष से संविधान तक, शब्दों से सपनों तक: विश्व पुस्तक मेले में बच्चों संग ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला की प्रेरक उड़ान

By विनय मिश्रा नई दिल्लीदिनांक 13 जनवरी 2026, अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) तक जाने वाले पहले भारतीय, ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला 2026 के एम्फीथियेटर में विभिन्न स्कूलों से आए बच्चों से संवाद किया। युवराज मलिक, निदेशक, एनबीटी-इंडिया द्वारा संचालित एक सत्र में, ग्रुप कैप्टन शुक्ला ने युवा दर्शकों को भारतीय वायु सेना के पायलट के रूप में अपने शुरुआती दिनों से लेकर अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन का दौरा करने वाले पहले भारतीय बनने तक की प्रेरक यात्रा करवाई, जिससे छात्रों के बीच जिज्ञासा और सपने जागे।

अंतरिक्ष से संविधान तक, शब्दों से सपनों तक: विश्व पुस्तक मेले में बच्चों संग ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला की प्रेरक उड़ान

उन्होंने बहुत ईमानदारी, आत्मीयता और हल्केे-फुल्के अंदाज में बच्चों के साथ अपने अंतरिक्ष यात्रा की तैयारी और पूरे सफर को याद किया। अपनी यात्रा को पूरे राष्ट्र की यात्रा बताते हुए उन्होंने कहा, “मैं एक अरब दिलों को साथ लेकर अंतरिक्ष गया था।” विद्यार्थियों का उत्साह बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि उनमें से ही कोई भविष्य का अंतरिक्ष यात्री बनकर भारत की अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाओं का नेतृत्व कर सकता है।

ग्रुप कैप्टन शुक्ला ने बच्चों को भारतीय वायुसेना के पायलट के रूप में अपने शुरुआती दिनों से लेकर अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर जाने वाले पहले भारतीय बनने तक की प्रेरक यात्रा के बारे में बेहद रोचक अंदाज में बताते हुए विद्यार्थियों की जिज्ञासा बढ़ाई। उन्होंने बताया कि अंतरिक्ष में केवल 20 दिन बिताने के लिए उन्हें पाँच वर्षों तक प्रशिक्षण लेना पड़ा। इससे यह पता चलता है किसी काम को करने के लिए कितनी मेहनत और समर्पण की जरूरत होती है। उन्होंने छात्रों को सलाह दी कि केवल रोमांचक क्षणों ही नहीं, बल्कि साधारण और रोज़मर्रा के कामों का भी आनंद लेना सीखना चाहिए।

इस पूरे सफर में उन्होंने अपने डर को भी खुलकर स्वीकार किया और बताया कि जब फाल्कन-9 रॉकेट के इंजन स्टार्ट हुए तो “मेरे शरीर की हर हड्डी काँप रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे सारी तैयारी करने के बावजूद प्रश्नपत्र सामने आते ही आप सब कुछ भूल जाऍं।” उन्होंने फेफड़ों पर दबाव, साँस लेने में कठिनाई जैसी शारीरिक परेशानियों के साथ परिवार से दूर रहने की मानसिक चुनौती के बारे में भी ईमानदारी से बताया। आठ मिनट के रोमांच और आठ मीटर की दूरी के रोमांचक सवाल पर उन्होंने कहा कि यह सिर्फ मेरे लिए ही नहीं, बल्कि मेरे परिवार के लिए भी चुनौतीपूर्ण था। 

शुभांशु शुक्ला ने साझा किए अंतरिक्ष के यादगार किस्से:

वीडियो के साथ कुछ रोचक किस्से सुनाते हुए उन्होंने अंतरिक्ष यात्रा के यादगार पल साझा किए। टूथपेस्ट करने से लेकर, अंतरिक्ष में गेंद की जगह एक अंतरिक्ष यात्री के साथ बास्केटबॉल खेलना, पृथ्वी पर लौटने के बाद गुरुत्वाकर्षण भूल जाने के कारण अपना लैपटॉप गिरा देना, और लॉन्च पैड की ओर जाते समय फिल्म फाइटर का गीत “वंदे मातरम्” सुनना, ऐसे कई यादगार किस्से थे, जिन्हें सभी साँस रोके सुन रहे थे। उन्होंने बताया कि जितनी तैयारी अंतरिक्ष यात्रा पर जाने के लिए करनी पड़ी थी, वैसा ही अभ्यास धरती पर लौटने के बाद करना पड़ा। गुरुत्वाकर्षण बल को फिर से महसूस करना, यहाँ तक कि अपनी पलकों का वजन भी महसूस होता था और लौटकर वापस सीधी रेखा में चलने का अभ्यास, ऐसी ही कौशल थे जिन्हें उन्हें फिर से सीखना पड़ा।

अंतरिक्ष से संविधान तक, शब्दों से सपनों तक: विश्व पुस्तक मेले में बच्चों संग ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला की प्रेरक उड़ान

उन्होंने छात्रों को मोबाइल फोन का बेहतर उपयोग करने, पढ़ने, सीखने और पॉडकास्ट सुनने की सलाह दी और डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की पुस्तक विंग्स ऑफ फायर पढ़ने की अनुशंसा की। दृढ़ता पर ज़ोर देते हुए उन्होंने कहा कि डर केवल भविष्य की चिंता है। डर और उत्साह दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इसलिए हमें उत्साह को चुनना चाहिए।

ग्रुप कैप्टन शुक्ला ने अपने मार्गदर्शकों और प्रेरणास्रोतों को भी भावभीनी श्रद्धांजलि दी। भारत के पहले अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा को याद करते हुए, जिनका जन्मदिन आज ही के दिन था, उन्होंने कहा कि चार दशक बाद भी अंतरिक्ष से भारत को लेकर शर्मा का ऐतिहासिक कथन “सारे जहाँ से अच्छा” ही सबसे बेहतर है। कुछ सच्चाइयाँ कालातीत होती हैं।

उन्होंने अपनी कमांडर डॉ. पैगी व्हिटसन का भी उल्लेख किया और बताया कि अंतरिक्ष यात्री बनने से पहले उन्हें नौ बार रिजेक्ट किया गया था। जबकि आज वे विश्व की सबसे अनुभवी अंतरिक्ष यात्री हैं। पुरुष या महिला किसी भी अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री की तुलना में उन्होंने अंतरिक्ष में सबसे अधिक दिन बिताए हैं। जो दृढ़ संकल्प का जीवंत उदाहरण है।

इन प्रेरक कहानियों को भारत के भविष्य से जोड़ते हुए उन्होंने गगनयान मिशन, भारत के अपने अंतरिक्ष स्टेशन की योजनाओं और 2040 तक भारतीय को चंद्रमा पर भेजने के दृष्टिकोण पर बात की। बच्चों की ओर मुखातिब होते हुए उन्होंने कहा कि भारत की अंतरिक्ष यात्रा केवल संस्थानों के भरोसे नहीं, बल्कि उन व्यक्तियों से आगे बढ़ेगी जो सुविधा के बजाय साहस, डर के बजाय जिज्ञासा को चुनते हैं। हो सकता है कि यहां बैठा कोई बच्चा एक दिन भारत का तिरंगा पृथ्वी से परे लेकर जाए।

थीम पवेलियन में आयोजित एक चर्चा सत्र में महान कवि और गीतकार आनंद बक्शी के जीवन और विरासत का उत्सव मनाया गया। इस अवसर पर उनके पुत्र राकेश बक्शी के साथ यूनुस ख़ान, डॉ. शालिनी अगम और संगीता बिजित उपस्थित रहीं। वक्ताओं ने आनंद बक्शी की व्यक्तिगत यात्रा को याद करते हुए बताया कि विभाजन के बाद रावलपिंडी से लौटते समय वे अपनी माँ की एक तस्वीर उनकी अंतिम स्मृति के रूप में साथ लाए थे। उन्होंने उनकी अनोखी रचनात्मक प्रक्रिया पर भी प्रकाश डाला और बताया कि प्रकृति या पुस्तकों से प्रेरणा लेने के बजाय आनंद बक्शी अक्सर सोफे पर या अपने बैठक कक्ष के किसी शांत कोने में बैठकर, भावनाओं के सहारे गीत रचते थे।

ऑथर्स कॉर्नर में वरिष्ठ वकील अश्विनी कुमार ने शिबानी सेठी के साथ संवाद में भारतीय संविधान की स्थायी शक्ति और गरिमा पर चर्चा की तथा प्रत्येक नागरिक के अधिकारों और सम्मान की रक्षा में उसकी भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने भारत की लोकतांत्रिक आत्मा को बनाए रखने में युवाओं की भूमिका पर ज़ोर देते हुए युवा पीढ़ी के “युवा आदर्शवाद” को राष्ट्रीय शक्ति का महत्वपूर्ण स्रोत बताया।

सार्वजनिक जीवन में करुणा और सहानुभूति के मूल्यों का आह्वान करते हुए उन्होंने भारतीय लोकतंत्र के भविष्य को लेकर आशा व्यक्त की और गणराज्य की विरासत को सुरक्षित रखने के लिए नैतिक नेतृत्व तथा सक्रिय नागरिक सहभागिता की आवश्यकता पर बल दिया।

इंटरनेशनल इवेंट कॉर्नर में “वर्किंग अक्रॉस टाइम: मेमोरी, आइडेंटिटी एंड हिस्ट्री” शीर्षक से एक विचारोत्तेजक समूह चर्चा आयोजित की गई, जिसमें ऑस्ट्रियाई उपन्यासकार वैलेरी फ्रिट्श और यूक्रेनी लेखक ल्युब्को देरेश शामिल हुए। इस संवाद में स्मृति, पहचान और मानवीय चेतना जैसे विषयों पर चर्चा हुई, जिससे संस्कृतियों और भौगोलिक सीमाओं के पार सहानुभूति का सेतु बना। दर्शकों को लोहड़ी की शुभकामनाएँ देते हुए देरेश ने बताया कि उनका लेखन का सफर 16 वर्ष की आयु में शुरू हुआ और संगीत व चेतना की परिवर्तित अवस्थाओं का उनके रचनात्मक कार्य पर गहरा प्रभाव रहा। फ्रिट्श ने पीढ़ीगत आघात पर बात करते हुए कहा कि संस्कृति और भाषा के साथ-साथ मौन भी विरासत में मिलता है। उन्होंने शब्दों की असीम शक्ति को रेखांकित करते हुए कहा, “सिर्फ 26 अक्षरों से अनंत संसार रचे जा सकते हैं।” इसके बाद क्योको ताकेमोटो द्वारा जापानी भाषा कार्यशाला आयोजित की गई, जिसमें जापानी संप्रेषण, सांस्कृतिक दर्शन और वैश्विक शैक्षणिक व सांस्कृतिक सहभागिता पर प्रकाश डाला गया।

बाल मंडप में कहानी सत्रों, रंगमंच कार्यशालाओं, माइंडफुल आर्ट, खाद्य सुरक्षा पर पोस्टर निर्माण और बाल फिल्म प्रदर्शन जैसी गतिविधियों से भरा एक और जीवंत दिन रहा। लेखकों, शिक्षकों और रचनात्मक समूहों द्वारा संचालित इन रोचक गतिविधियों के माध्यम से बच्चों की कल्पनाशक्ति, अभिव्यक्ति और जागरूकता को प्रोत्साहित किया गया। 

एम्फीथिएटर में भारतीय सेना बैंड की एक विशेष प्रस्तुति ने बड़ी संख्या में दर्शकों को आकर्षित किया। जब बैंड ने जोशीला देशभक्ति से भरपूर वाद्य संगीत प्रस्तुत किया, तो उनकी अनुशासित और सटीक प्रस्तुति ने गर्व और देशभक्ति की गहरी भावना जगाई, जिससे माहौल मंत्रमुग्ध हो गया। इसके पश्चात आयोजित कवि सम्मेलन में साहित्यिक प्रतिभा का जीवंत प्रदर्शन देखने को मिला, जहाँ कवियों ने भावनाओं, हास्य और सामाजिक सरोकारों से सजी रचनाएँ प्रस्तुत कीं और श्रोताओं को अंत तक बाँधे रखा।

पुस्तक मेले में पधारने वाले गणमान्य व्यक्तियों में रक्षा निखिल खडसे, माननीय केंद्रीय युवा कार्य एवं खेल राज्य मंत्री, तथा अश्विनी कुमार, पूर्व कानून एवं न्याय मंत्री, प्रमुख रूप से शामिल थे।

पाठकों, परिवारों, छात्रों, शिक्षकों और पुस्तक प्रेमियों को 10 से 18 जनवरी (प्रवेश निःशुल्क) तक भारत मंडपम में आयोजित नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला 2026 में आमंत्रित किया जाता है, जहाँ वे वैश्विक साहित्य से परिचित हो सकते हैं, लेखकों और विचारों से संवाद कर सकते हैं और पठन तथा ज्ञान के भारत के सबसे बड़े उत्सव का हिस्सा बन सकते हैं।



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