By प्रदीप कुमार नई दिल्ली: 1984 के सिख कत्लेआम से जुड़े मामलों में न्याय की लंबी प्रतीक्षा के बीच दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (DSGMC) ने आरोपियों के खिलाफ चल रहे मुकदमों की सुनवाई में तेजी लाने की मांग की है। कमेटी के अध्यक्ष सरदार हरमीत सिंह कालका, महासचिव सरदार जगदीप सिंह काहलों और धर्म प्रचार चेयरमैन जसप्रीत सिंह करमसर ने कहा कि चार दशक से अधिक समय बीत जाने के बावजूद पीड़ित परिवारों को पूर्ण न्याय का इंतजार है।
“सज्जन कुमार को फांसी होती तो जख्मी सिख हृदयों को ज्यादा सुकून मिलता”—DSGMC नेताओं ने कहा कि 1984 के सिख विरोधी दंगों के मामलों में दोषी ठहराए गए कांग्रेस नेता सज्जन कुमार को यदि अदालत से मृत्युदंड मिलता और उसे फांसी दी जाती, तो संभवतः लंबे समय से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे सिख परिवारों के जख्मों को अधिक सांत्वना मिलती। उन्होंने कहा कि जिन लोगों पर इतने गंभीर अपराधों में दोष सिद्ध हुआ, उनके मामलों में कठोरतम कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।
1984 के जख्म आज भी ताजा, न्याय की लड़ाई जारी
सरदार हरमीत सिंह कालका, सरदार जगदीप सिंह काहलों और जसप्रीत सिंह करमसर ने आरोप लगाया कि 1984 के सिख कत्लेआम के दौरान सैकड़ों सिखों की हत्या हुई और हिंसक भीड़ द्वारा घरों को निशाना बनाया गया। उन्होंने कहा कि उन भयावह घटनाओं ने हजारों परिवारों को ऐसा दर्द दिया, जिसे चार दशक बाद भी भुलाया नहीं जा सका है।
DSGMC नेताओं ने कहा कि सिख समुदाय के लिए यह केवल पुराने मुकदमों का विषय नहीं, बल्कि न्याय, सम्मान और जवाबदेही की लंबी लड़ाई है। उनका कहना है कि दोषियों को सजा मिलने से पीड़ित परिवारों के मन में यह विश्वास मजबूत होगा कि कानून और न्याय व्यवस्था अंततः उनके साथ खड़ी है।
उम्रकैद पर भी सवाल, बोले—मौत की सजा मिलती तो ज्यादा संतोष होता
नेताओं ने कहा कि सज्जन कुमार को दो मामलों में उम्रकैद की सजा मिल चुकी है, जबकि अन्य मामलों में कानूनी प्रक्रिया जारी रही है। उन्होंने कहा कि उनके विचार से इतने गंभीर अपराधों में यदि अदालत मृत्युदंड देती, तो पीड़ित समुदाय को अधिक संतोष मिलता। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि हर मामले में अंतिम फैसला अदालत द्वारा उपलब्ध साक्ष्यों और कानून के आधार पर ही होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि न्याय में देरी का दर्द उन परिवारों से बेहतर कोई नहीं समझ सकता, जिन्होंने अपने प्रियजनों को खोया और दशकों तक अदालतों के चक्कर लगाए।
“देर से मिला न्याय, न्याय से इनकार के समान”
DSGMC पदाधिकारियों ने कहा कि यह कहावत 1984 के मामलों पर पूरी तरह लागू होती है कि “देर से दिया गया न्याय, न्याय से इनकार के समान है।” उनके अनुसार, चार दशक से अधिक समय बीत जाना अपने आप में इस बात को रेखांकित करता है कि लंबित मामलों को सामान्य गति से नहीं, बल्कि प्राथमिकता के आधार पर आगे बढ़ाया जाना चाहिए।
उन्होंने अदालतों से अपील करते हुए कहा कि जगदीश टाइटलर, कमलनाथ और अन्य आरोपियों से जुड़े लंबित मामलों की सुनवाई में तेजी लाई जाए और जिन मामलों में दोष सिद्ध हो, उनमें कानून के मुताबिक कठोर सजा सुनिश्चित की जाए।
DSGMC बोली—हर दोषी को सजा मिलने तक जारी रहेगी पैरवी
सरदार कालका, सरदार काहलों और सरदार करमसर ने कहा कि दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी 1984 के मामलों में पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए लगातार पैरवी करती रही है और आगे भी पूरी मजबूती के साथ यह लड़ाई जारी रखेगी।
उन्होंने कहा कि न्याय केवल सजा तक सीमित नहीं है, बल्कि पीड़ित परिवारों के भरोसे को बहाल करने का माध्यम भी है। चार दशक से लंबित मामलों में तेजी लाना समय की सबसे बड़ी जरूरत है, ताकि न्याय प्रक्रिया पर लोगों का विश्वास और मजबूत हो।
“जब तक हर दोषी को सजा नहीं मिलती, चैन से नहीं बैठेंगे”
DSGMC नेताओं ने दो टूक कहा कि सिख समुदाय ने 1984 के मामलों में न्याय के लिए लंबी और कठिन लड़ाई लड़ी है और यह संघर्ष आगे भी जारी रहेगा। उन्होंने कहा, “जब तक हर दोषी को सजा नहीं मिलती, हम चैन से नहीं बैठेंगे, क्योंकि यह हमारी कौम की बहुत बड़ी लड़ाई है।”
उन्होंने उम्मीद जताई कि लंबित मामलों में न्यायिक प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ेगी और कानून के अनुसार दोषियों को उनके अपराध की सजा मिलेगी। DSGMC ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि 1984 के पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाना उसकी प्राथमिकताओं में शामिल है और इस मुद्दे पर संघर्ष तब तक जारी रहेगा, जब तक न्याय की प्रक्रिया अपने अंतिम मुकाम तक नहीं पहुंचती।

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