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भारत में पहली बार! Genetic Heart Disease से पीड़ित दो भाइयों का Fortis Escorts Okhla में सफल Heart Transplant

By विनय मिश्रा नई दिल्ली: दिनांक 28 मई, 2026, एक ही परिवार के दो भाइयों को एक दशक के दौरान एक अलग तरह की चिकित्सकीय यात्रा करनी पड़ी। एडवांस्ड डाइलेटेड कार्डियोमायोपैथी होने की वजह से 11 वर्षों के दौरान दोनों भाइयों का हार्ट ट्रांसप्लाट किया गया। एडवांस्ड डाइलेटेड कार्डियोमायोपैथी हृदय की मांसपेशियों को प्रभावित करने वाला ऐसा रोग है जो गंभीर हार्ट फेल की वजह बन सकती है। दोनों ही भाइयों की सर्जरी डॉ. ज़ेड. एस. मेहरवाल, चेयरमैन एवं हेड, एडल्ट कार्डिएक सर्जरी, हार्ट ट्रांसप्लांटेशन एंड वीएडी प्रोग्राम, फोर्टिस एस्कॉर्ट्स, ओखला, नई दिल्ली की देखरेख में हुई।

Fortis Escorts Okhla में डॉक्टरों की टीम दो भाइयों के दुर्लभ Genetic Heart Disease Heart Transplant केस की जानकारी देते हुए।

बड़े भाई में इस बीमारी के लक्षण 16 वर्ष की उम्र से दिखने शुरू हो गए थे। इसकी शुरुआत बेवजह होने वाली थकान से हुई थी, जो बाद में सांस लेने की दिक्कत जैसी गंभीर समस्या बन गई। इसके अलावा, पैरों में सूजन और बार-बार हार्ट फेल जैसे लक्षण भी दिखने लगे। विस्तार से की गई चिकित्सकीय जांच से एडवांस्ड डाइलेटेड कार्डियोमायोपैथी (डीसीएम) का पता चला। इस बीमारी में हृदय की मांसपेशियों का विस्तार हो जाता है और वे कमजोर हो जाती हैं और इस वजह से प्रभावी ढंग से खून को पंप करने की क्षमता भी कम हो जाती है। व्यापक मेडिकल थेरेपी के बाद भी उनकी स्थिति खराब होती गई और वर्ष 2015 में फोर्टिस एस्कॉर्ट्स, ओखला में उनका हार्ट ट्रांसप्लांट किया गया।  

हालांकि, 11 वर्षों बाद इतिहास ने खुद को दोहराया। छोटे भाई को 27 वर्ष की उम्र में वैसे ही लक्षण दिखने शुरू हो गए, जबकि इससे पहले उसे किसी तरह की समस्या नहीं आई थी। इसके अलावा, सांस लेने में दिक्कत, कसरत करने की कम होती क्षमता, हार्ट फेल होने की वजह से बार-बार अस्पताल में भर्ती होने जैसी समस्याएं भी महसूस होने लगीं। क्लिनिकल जांच में भी इसी बीमारी की पुष्टि हुई कि उन्हें आखिरी स्टेज का डाइलेटेड कार्डियोमायोपैथी है। चूंकि उनकी स्थिति धीरे-धीरे अंतिम स्टेज के हार्ट फेल तक पहुंच रही थी, ऐसे में हार्ट ट्रांसप्लांट ही एकमात्र सटीक उपचार लगा।

डोनर और ट्रांसप्लांट कराने वाले व्यक्ति की खून की धमनियों के आकार में अंतर होने की वजह से इस हार्ट ट्रांसप्लांट में तमाम तरह की तकनीकी चुनौतियां सामने आने लगीं। इसके कारण ट्रांसप्लांट के दौरान विशेष प्रकार की सर्जिकल तकनीकों की ज़रूरत थी। हालांकि, डोनर के हार्ट इंप्लांटेशन के लिए ज़रूरी समयावधि के भीतर ही ट्रांसप्लांट का काम सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया। इस मामले में मृत डोनर रोहतक का 37 वर्ष का पुरुष था जिसकी मृत्यु इंट्राक्रेनियल हैमरेज की वजह से हुई थी। ट्रांसप्लांट के बाद, छोटे भाई की तबियत में तेज़ी से सुधार हुआ और ऑपरेशन के बाद की व्यापक देखभाल और निगरानी के बाद ठीक हो जाने पर उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।

डॉ. जे़ड. एस. मेहरवाल, चेयरमैन एवं हेड, एडल्ट कार्डिएक सर्जरी, हार्ट ट्रांसप्लांटेशन एंड वीएडी प्रोग्राम, फोर्टिस एस्कॉर्ट्स, ओखला, नई दिल्ली ने कहा, "फोर्टिस एस्कॉर्ट्स ओखला ने 23 हार्ट ट्रांसप्लांट सफलतापूर्वक किए हैं जो इस संस्थान बेहतर होती विशेषज्ञता और अंतिम चरण के हार्ट फेल के मुश्किल मामलों से निपटने की आधुनिक क्षमता को दर्शाता है। ट्रांसप्लांट के हर मामले में हमारी प्रतिबद्धता जीवन बचाने और कार्डिएक केयर और ट्रांसप्लांटेशन के क्षेत्र में अपनी उत्कृष्टता के माध्यम से मरीज़ को सेहतमंद जीवन जीने का मौका देने की होती है।" 

डॉ. मेहरवाल ने आगे कहा, "छोटे भाई की जांच के बाद डॉक्टरों ने परिवार के अन्य सदस्यों की भी कार्डिएक जांच कराने की सलाह दी। उनका यह सफर अनुवांशिक हृदय रोगों की घातक पहुंच और आधुनिक हार्ट ट्रांसप्लांटेशन के क्षेत्र में हुई असाधारण प्रगति, दोनों को दर्शाता है जिससे बेहद जटिल मामलों में भी लोगों को नया जीवन मिलने की उम्मीद जगी है।"

डॉ. विशाल रस्तोगी, निदेशक, कार्डियोलॉजी, फोर्टिस एस्कॉर्ट्स, ओखला, नई दिल्ली ने कहा, "यह पैटर्न, अनुवांशिक कार्डियोमायोपैथी को बहुत स्पष्ट तौर पर दर्शाता है जहां एक अनुवांशिक समस्या धीरे-धीरे हृदय की मांसपेशियों को कमजोर करने से पहले वर्षों तक दबी रहती है। हो सकता है कि किसी एक व्यक्ति के हार्ट फेल के कारण सामने न आएं, लेकिन असल में यह पूरे परिवार पर मंडराता एक संकट हो सकता है जो जीवन के अलग-अलग चरण में परिवार के अलग-अलग लोगों को प्रभावित कर सकता है।"

डॉ. विक्रम अग्रवाल, फेसिलिटी निदेशक एवं वाइस-प्रेसिडेंट, फोर्टिस एस्कॉर्ट्स, ओखला, नई दिल्ली ने कहा, "हमारी जानकारी के हिसाब से यह भारत का पहला ऐसा मामला है जहां दो भाई अनुवांशिक कार्डियोमायोपैथी का सामना करते हैं और 11 वर्षों के अंतराल में सफलतापूर्वक हार्ट ट्रांसप्लांटेशन से गुजरते हैं। यह भी दिलचस्प है कि दोनों भाइयों की सर्जरी एक ही अस्पताल में और एक ही सर्जिकल टीम करती है। दूसरे ट्रांसप्लांट से पूरे परिवार का इस बीमारी को लेकर नजरिया ही बदल गया। इस बीमारी को अब तक वे एक अकेली आपदा के तौर पर देख रहे थे, वह स्पष्ट तौर पर साझा अनुवांशिक जोखिम बन गया जिससे पूरा परिवार प्रभावित हो सकता था।"

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