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Ambedkar International Centre में Service Extension और Tender Process पर घमासान! शिकायत में लगे गंभीर आरोप

By विनय मिश्रा नई दिल्ली : डॉ. अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर जैसे प्रतिष्ठित सरकारी संस्थान में कार्यरत अधिकारी की भूमिका को लेकर सामने आई शिकायत ने प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रधानमंत्री कार्यालय, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, केंद्रीय सतर्कता आयोग और डॉ. अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर के सदस्य सचिव को भेजी गई शिकायत में सेंटर के निदेशक आकाश पाटिल जो डेप्युटेशन पर सेना से आये थे 2 साल डेपुटेशन पीरियड के बाद तीसरी बार विस्तार लेने के पश्चात अब चौथे विस्तार के लिए जुगत लगा रहें हैं। जो प्रशासनिक रूप से अनैतिक है सूत्रों के अनुसार मंत्री जी के खास होने के चलते चौथी बार भी इनको सेवा विस्तार दिया जा सकता है। वहीं दूसरी तरफ एन एस एल अधिकारी गौरव मीणा जो एन.बी. सी.सी के ही एक पार्ट में कार्यरत हैं पर गंभीर अनियमितताओं और कथित भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए हैं। शिकायतकर्ता ने अपना नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि मैंने अपने पत्र में इस मामले की निष्पक्ष जांच कराए जाने की मांग की है।

Ambedkar International Centre Director आकाश पाटिल और Service Extension को लेकर शिकायत

शिकायत में सबसे बड़ा सवाल उस व्यवस्था को लेकर उठाया गया है, जिसमें एन.एस.एल का सर्विस चार्ज अन्य कंपनियों की तुलना में अधिक होने के बावजूद उसी कंपनी को बार-बार सेवा विस्तार दिए जाने का आरोप लगाया गया है। शिकायतकर्ता का कहना है कि सरकारी क्षेत्र की अन्य कंपनियां कम सर्विस चार्ज पर बेहतर सेवाएं देने के लिए उपलब्ध हैं, इसके बावजूद कथित तौर पर उसी कंपनी को लगातार काम मिलता रहा। यदि यह आरोप जांच में सही पाए जाते हैं तो यह सरकारी संस्थान में निविदा प्रक्रिया, प्रतिस्पर्धा और वित्तीय पारदर्शिता की व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े कर सकता है।

बार-बार सेवा विस्तार का मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकारी संस्थानों में किसी सेवा प्रदाता को लंबे समय तक काम देने के पीछे स्पष्ट प्रशासनिक और वित्तीय औचित्य होना अपेक्षित है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि यदि दूसरी कंपनियां कम लागत और बेहतर सेवाओं का विकल्प उपलब्ध करा रही थीं तो फिर उसी कंपनी को लगातार विस्तार देने की जरूरत क्यों पड़ी ? क्या प्रत्येक विस्तार से पहले तुलनात्मक वित्तीय और तकनीकी मूल्यांकन किया गया? क्या प्रतिस्पर्धी कंपनियों से प्रस्ताव आमंत्रित किए गए और यदि किए गए तो उनकी तुलना किस आधार पर की गई? शिकायत इन सवालों की स्वतंत्र जांच की जरूरत को रेखांकित करती है।

शिकायत में एक अन्य गंभीर आरोप यह है कि सेंटर के रखरखाव का काम करने वाली कंपनी को ही वहां कार्यक्रमों के आयोजन का काम भी दिया जा रहा है। शिकायतकर्ता ने इसे प्रशासनिक दृष्टि से अनैतिक और नियमों के विपरीत प्रतीत होने वाला मामला बताया है। यदि एक ही एजेंसी को अलग-अलग प्रकृति के कार्य लगातार दिए जा रहे हैं तो यह भी जांच का विषय बनता है कि इन कार्यों के लिए अलग-अलग निविदा या चयन प्रक्रिया अपनाई गई थी अथवा नहीं।

पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जिन अधिकारियों की निगरानी में संस्थान की खरीद, सेवा और अनुबंध संबंधी व्यवस्थाएं संचालित होती हैं, उनके कार्यकाल के दौरान बार-बार एक ही सेवा प्रदाता को लाभ मिलने के आरोपों की स्वतंत्र समीक्षा क्यों न की जाए। शिकायत में दोनों अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाते हुए आरोपों की निष्पक्ष जांच और सत्य पाए जाने पर कठोर कार्रवाई की मांग की गई है।

हालांकि शिकायत में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि इस दस्तावेज से नहीं होती और संबंधित अधिकारियों या कंपनी का पक्ष इसमें दर्ज नहीं है। इसलिए आरोपों को अंतिम सत्य मानने के बजाय जांच के निष्कर्षों की प्रतीक्षा जरूरी है। लेकिन शिकायत में उठाए गए सवाल इतने गंभीर हैं कि बार-बार सेवा विस्तार, अधिक सर्विस चार्ज और एक ही कंपनी को रखरखाव के साथ इवेंट संबंधी कार्य दिए जाने की पूरी प्रक्रिया की पारदर्शी जांच की मांग जरूर मजबूत होती है। बाबा साहेब डॉ. अंबेडकर के नाम से जुड़े इस प्रतिष्ठित संस्थान में सार्वजनिक धन और प्रशासनिक निर्णयों को लेकर पूर्ण पारदर्शिता ही उसकी गरिमा और जनता के विश्वास को कायम रख सकती है।

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