Published by : BST News Desk
समालखा : दिनांक 27 अक्टूबर 2026, प्रेम, भक्ति, सेवा और आध्यात्मिक चेतना के दिव्य वातावरण में 79वां वार्षिक निरंकारी संत समागम भव्य रूप से संपन्न हुआ। समागम के समापन दिवस पर निरंकारी सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने विशाल मानव परिवार को जीवन में ब्रह्मज्ञान की शिक्षाओं को अपनाने और उन्हें अपने विचारों, व्यवहार तथा कर्मों में उतारने की प्रेरणा दी। लाखों की संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं के बीच सतगुरु माता जी का संदेश इस बात पर केंद्रित रहा कि सच्ची आध्यात्मिक जागृति केवल ज्ञान सुनने में नहीं, बल्कि उसे अपने जीवन में जीने में है। समागम का समापन श्रद्धा, प्रेम और मानवता की भावना से ओतप्रोत वातावरण में हुआ।
आध्यात्मिक जागृति से मानव कल्याण तक का संदेश
‘जागृति’ की आध्यात्मिक प्रेरणाओं से सराबोर इस संत समागम ने श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन, सकारात्मक जीवनशैली और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझने का अवसर प्रदान किया। चार दिनों तक चले इस आध्यात्मिक आयोजन में प्रेम, भक्ति, सेवा और सद्भाव के विचारों ने संगत को प्रेरित किया। समागम से प्राप्त आध्यात्मिक अनुभूतियों और मधुर स्मृतियों को अपने हृदय में संजोकर श्रद्धालु अपने-अपने गंतव्यों की ओर रवाना होने लगे। यह आयोजन केवल एक धार्मिक समागम तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जीवन में अच्छे विचारों को अपनाने और समाज में आपसी प्रेम एवं एकता को मजबूत करने की प्रेरणा देने वाला अवसर बना।
ब्रह्मज्ञान को जीवन में उतारना ही सच्ची जागृति: सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज
समापन दिवस पर सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने अपने पावन प्रवचनों में स्पष्ट किया कि ‘जागृति’ का अर्थ केवल सत्संग सुनना या किसी आध्यात्मिक आयोजन में शामिल होना नहीं है। वास्तविक जागृति तब आती है, जब मनुष्य निराकार परमात्मा के अहसास के साथ जीवन जीते हुए अपने आचरण में सकारात्मक परिवर्तन लाता है। ब्रह्मज्ञान की सार्थकता इसी में है कि उससे प्राप्त आध्यात्मिक समझ हमारे विचारों को निर्मल बनाए, व्यवहार में विनम्रता लाए और कर्मों में मानवता का भाव प्रकट करे। जब आध्यात्मिक ज्ञान जीवन का हिस्सा बन जाता है, तब व्यक्ति स्वयं के उत्थान के साथ-साथ दूसरों के जीवन में भी सकारात्मक बदलाव लाने का माध्यम बन सकता है।
प्रेम, करुणा और विनम्रता से मजबूत होते हैं रिश्ते
सतगुरु माता जी ने श्रद्धालुओं को सकारात्मक सोच अपनाने, प्रेम और करुणा के साथ व्यवहार करने तथा जीवन में विनम्रता बनाए रखने की प्रेरणा दी। उन्होंने दूसरों की कमियों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय उनकी अच्छाइयों और विशेषताओं को देखने की भावना को महत्व दिया। यह संदेश आज के सामाजिक परिवेश में विशेष महत्व रखता है, जहां आपसी समझ, सहनशीलता और संवाद के माध्यम से रिश्तों को मजबूत बनाने की आवश्यकता है। सच्ची आध्यात्मिकता वही है, जो मनुष्य को अहंकार से दूर करके दूसरों के प्रति सम्मान, सहयोग और सद्भाव का भाव विकसित करने के लिए प्रेरित करे।
घर-परिवार से शुरू होती है आध्यात्मिक जागृति
सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज के संदेश में इस बात पर विशेष बल रहा कि वास्तविक जागृति की शुरुआत व्यक्ति के अपने जीवन और घर-परिवार से होती है। यदि मनुष्य अपने दैनिक व्यवहार में प्रेम, धैर्य, सहनशीलता और विनम्रता को स्थान देता है, तो परिवार में सुखद वातावरण के साथ समाज में भी सकारात्मकता का विस्तार होता है। सेवा, सुमिरन और सत्संग को जीवन का अभिन्न अंग बनाकर हर परिस्थिति में परमात्मा का अहसास बनाए रखना व्यक्ति को मानसिक संतुलन, आत्मिक शांति और सद्भाव की दिशा में प्रेरित करता है। इस प्रकार आध्यात्मिकता केवल विचारों तक सीमित न रहकर जीवन जीने की एक सार्थक पद्धति बन जाती है।
संत निरंकारी मंडल ने जताया आभार, संगत की बढ़ती भागीदारी पर प्रसन्नता
इस अवसर पर संत निरंकारी मंडल के सचिव आदरणीय जोगिंदर सुखीजा ने सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज एवं निरंकारी राजपिता जी के पावन दर्शन कर उनके दिव्य आशीर्वाद के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की। उन्होंने समस्त साध-संगत के साथ उन सभी सरकारी विभागों और संबंधित सहयोगियों का भी हार्दिक आभार प्रकट किया, जिनके सहयोग से समागम का सफल आयोजन संभव हुआ। सुखीजा ने इस वर्ष पिछले वर्षों की अपेक्षा अधिक संख्या में श्रद्धालुओं के शामिल होने पर प्रसन्नता व्यक्त की और भविष्य में भी संगत की भागीदारी निरंतर बढ़ने की मंगलकामना की। श्रद्धालुओं की व्यापक उपस्थिति ने इस आध्यात्मिक आयोजन के प्रति लोगों की आस्था और सहभागिता को रेखांकित किया।
कवि दरबार बना समागम का विशेष आकर्षण, 80 कवियों ने बांधा समां
79वें वार्षिक निरंकारी संत समागम के चारों दिनों में आयोजित कवि दरबार ने साहित्य, आध्यात्मिकता और भावनात्मक अभिव्यक्ति का अनूठा संगम प्रस्तुत किया। इस आयोजन में बाल कवियों सहित महिला और पुरुष कवियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। ‘जागृति’ विषय पर आधारित इस कवि दरबार में कुल 80 कवियों ने अपनी स्वरचित कविताओं के माध्यम से आध्यात्मिक चेतना, प्रेम, भक्ति और जीवन मूल्यों को शब्दों में पिरोया। विभिन्न आयु वर्गों के कवियों की सहभागिता ने कार्यक्रम को विशेष आकर्षण प्रदान किया और नई प्रतिभाओं को अपनी रचनात्मकता प्रस्तुत करने का अवसर मिला।
नौ भाषाओं में गूंजी ‘जागृति’ की गूंज
कवि दरबार में हिंदी, राजस्थानी, पंजाबी, अंग्रेजी, हरियाणवी, मुल्तानी, मराठी, भोजपुरी और संस्कृत सहित विभिन्न भाषाओं में काव्य प्रस्तुतियां दी गईं। इन भावपूर्ण रचनाओं ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया और आध्यात्मिक संदेश को विविध भाषाई एवं सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों के माध्यम से सामने रखा। अलग-अलग भाषाओं में प्रस्तुत कविताओं ने यह भाव मजबूत किया कि प्रेम, सद्भाव, मानवता और आध्यात्मिक जागृति जैसे जीवन मूल्य भाषा और क्षेत्र की सीमाओं से परे हैं। कवि दरबार ने समागम की सांस्कृतिक गरिमा को बढ़ाते हुए साहित्य के माध्यम से आध्यात्मिक विचारों को जनमानस तक पहुंचाने का प्रभावशाली माध्यम प्रदान किया।
प्रेम, एकता और मानवता का संदेश देकर संपन्न हुआ 79वां निरंकारी संत समागम
इस प्रकार 79वां वार्षिक निरंकारी संत समागम सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज के आध्यात्मिक संदेश, प्रेमभक्ति और मानव कल्याण की भावना के साथ संपन्न हुआ। ‘जागृति’ की केंद्रीय प्रेरणा ने श्रद्धालुओं को यह समझने का अवसर दिया कि आध्यात्मिक ज्ञान का वास्तविक उद्देश्य जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाना और दूसरों के प्रति प्रेम, सम्मान तथा सहयोग की भावना विकसित करना है। समागम ने अनेकता में एकता, आपसी सद्भाव और संपूर्ण मानवता को प्रेम के सूत्र में पिरोने का संदेश दिया। श्रद्धालु यहां से आध्यात्मिक प्रेरणा और सेवा की भावना लेकर लौटे, ताकि इन मूल्यों को अपने दैनिक जीवन में अपनाकर समाज में शांति, भाईचारे और मानवीय संवेदनाओं को मजबूत बनाया जा सके।



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