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79th Nirankari Sant Samagam 2026: सतगुरु माता सुदीक्षा जी का दिव्य संदेश, लाखों श्रद्धालुओं की उमड़ी आस्था! CM नायब सिंह सैनी ने भी लिया आशीर्वाद

Published by : BST News Desk

समालखा : दिनांक 26 अक्टूबर 2026, हर परिस्थिति में परमात्मा के प्रति प्रेम, विश्वास और समर्पण बनाए रखना ही सच्ची आध्यात्मिक जागृति है। इसी प्रेरणादायी संदेश के साथ 79वें वार्षिक निरंकारी संत समागम का तीसरा दिन भक्ति, मानवता और विश्वबंधुत्व की अनुपम भावना से सराबोर रहा। हरियाणा के समालखा की पावन धरा पर देश-विदेश से पहुंचे लाखों श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने समागम को आध्यात्मिक एकता के भव्य उत्सव में बदल दिया। सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज के पावन दर्शनों और दिव्य प्रवचनों से श्रद्धालु भावविभोर नजर आए। समागम स्थल पर उमड़ी आस्था ने यह संदेश दिया कि सच्ची भक्ति केवल शब्दों या धार्मिक आयोजनों तक सीमित नहीं, बल्कि प्रेम, सद्भाव, सेवा और मानवीय संवेदनाओं के माध्यम से जीवन में उतरनी चाहिए।

79th Nirankari Sant Samagam 2026 में सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज का दिव्य प्रवचन और CM नायब सिंह सैनी द्वारा आशीर्वाद प्राप्त करने का दृश्य।

सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज का संदेश—परिस्थितियां बदलें, लेकिन परमात्मा के प्रति प्रेम न डगमगाए

79वें निरंकारी संत समागम के तीसरे दिन सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने अपने प्रेरणादायी प्रवचनों में कहा कि हर परिस्थिति में परमात्मा के प्रेम में स्थिर रहना ही वास्तविक जागृति है। जीवन में सुख-दुख, सफलता-असफलता और अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियां आती-जाती रहती हैं, लेकिन परमात्मा के प्रति सच्चा विश्वास मनुष्य को हर स्थिति में संतुलित रहने की प्रेरणा देता है। सतगुरु के संदेश का मूल भाव यही रहा कि भक्ति का वास्तविक मूल्य कठिन परिस्थितियों में सामने आता है। जब जीवन हमारी इच्छाओं के अनुरूप नहीं चलता, तब भी यदि मन में प्रेम, विश्वास और समर्पण बना रहे, तो यही आध्यात्मिक जागरूकता की सच्ची पहचान है।

ब्रह्मज्ञान से जागृत चेतना व्यवहार और विचारों में भी दिखाई देनी चाहिए

सतगुरु माता जी ने समझाया कि ब्रह्मज्ञान के माध्यम से प्राप्त आध्यात्मिक जागृति केवल किसी क्षण का अनुभव नहीं, बल्कि जीवनभर सजग और सचेत रहने की प्रेरणा है। इसका प्रभाव व्यक्ति के विचारों, व्यवहार, निर्णयों और समाज के प्रति उसके दृष्टिकोण में स्पष्ट दिखाई देना चाहिए। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि आध्यात्मिकता का वास्तविक उद्देश्य जीवन को बेहतर बनाना और दूसरों के प्रति संवेदनशीलता विकसित करना है। यदि मनुष्य परमात्मा की सर्वव्यापकता को पहचानता है, तो उसके व्यवहार में भी प्रेम, विनम्रता और सम्मान झलकना चाहिए। इस संदेश ने श्रद्धालुओं को आत्ममंथन करने और अपने दैनिक जीवन में आध्यात्मिक मूल्यों को अपनाने की प्रेरणा दी।

Nirankari Sant Samagam 2026 Samalkha: सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज का आध्यात्मिक संदेश, श्रद्धालुओं की उमड़ी भीड़ और मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने प्राप्त किया आशीर्वाद।

अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाते समय उद्देश्य की शुद्धता भी जरूरी

सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने अपने संदेश में यह महत्वपूर्ण विचार भी रखा कि अन्याय के विरुद्ध खड़े होते समय व्यक्ति को अपने उद्देश्य का आत्मनिरीक्षण अवश्य करना चाहिए। यह देखना आवश्यक है कि हमारा प्रयास वास्तव में किसी की भलाई और न्याय के लिए है या उसके पीछे अहंकार, स्वार्थ अथवा दिखावे की भावना छिपी हुई है। सतगुरु के संदेश का सार यह है कि सही उद्देश्य के साथ किया गया प्रयास ही समाज में सकारात्मक बदलाव ला सकता है। विचारों में मतभेद होने के बावजूद प्रत्येक व्यक्ति में परमात्मा के अंश को देखकर उसे स्वीकार करना और सम्मान देना निष्काम प्रेम की पहचान है। यही दृष्टिकोण समाज में आपसी सद्भाव, सहिष्णुता और मानवीय एकता को मजबूत कर सकता है।

निरंकारी राजपिता रमित जी ने दिया जागरूकता और सहज स्वीकार्यता का संदेश

सतगुरु माता जी के प्रवचनों से पूर्व निरंकारी राजपिता रमित जी ने भी श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक जागरूकता का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि जीवन में जहां परिवर्तन संभव हो, वहां सकारात्मक प्रयास किए जाने चाहिए, जबकि जिन परिस्थितियों को बदला नहीं जा सकता, उन्हें सहजता से स्वीकार करने की क्षमता विकसित करनी चाहिए। उनका संदेश जीवन की व्यावहारिक चुनौतियों से जुड़ा रहा। अक्सर मनुष्य उन परिस्थितियों को लेकर परेशान रहता है, जिन्हें वह अपने नियंत्रण में नहीं कर सकता। ऐसे में विवेक, धैर्य और सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ना जीवन को अधिक संतुलित और सार्थक बना सकता है।

भौतिक सुख-सुविधाओं के बीच आत्मा की वास्तविक प्यास को पहचानना जरूरी

निरंकारी राजपिता रमित जी ने अपने विचारों में इस बात पर भी ध्यान आकर्षित किया कि मनुष्य संसार की आवश्यकताओं, सुविधाओं और भौतिक उपलब्धियों के प्रति तो सजग रहता है, लेकिन कई बार अपनी आत्मा की वास्तविक प्यास को अनदेखा कर देता है। उन्होंने परमात्मा के प्रेम, उसकी सर्वव्यापकता की पहचान, अहंकार के त्याग और सच्ची जिज्ञासा के साथ जीवन जीने की प्रेरणा दी। आध्यात्मिक जागृति का अर्थ केवल धार्मिक गतिविधियों में भाग लेना नहीं, बल्कि स्वयं को बेहतर समझना, दूसरों के प्रति संवेदनशील होना और अपने जीवन में विनम्रता को स्थान देना भी है। समागम में दिए गए इन संदेशों ने श्रद्धालुओं को बाहरी उपलब्धियों के साथ आंतरिक शांति और आत्मिक विकास के महत्व पर विचार करने का अवसर दिया।

मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने प्राप्त किया सतगुरु का आशीर्वाद

79वें निरंकारी संत समागम के इस पावन अवसर पर हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज का आशीर्वाद प्राप्त किया। इसके साथ ही कई पार्षदों और विधायकों ने भी सतगुरु माता जी एवं निरंकारी राजपिता रमित जी के पावन दर्शन किए। समागम में विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोगों की उपस्थिति ने इस आयोजन के व्यापक सामाजिक और आध्यात्मिक स्वरूप को सामने रखा। इस अवसर का प्रमुख संदेश प्रेम, सद्भाव और मानवीय मूल्यों को जीवन में अपनाने की प्रेरणा रहा।

दिव्यांग श्रद्धालुओं के लिए विशेष व्यवस्थाएं, सुविधा और सम्मान को दी गई प्राथमिकता

समागम में दिव्यांग संत-महात्माओं की सुविधा का विशेष ध्यान रखा गया। आयोजन स्थल के सभी प्रवेश द्वारों पर व्हीलचेयर की व्यवस्था की गई, ताकि उन्हें समारोह स्थल तक पहुंचने में कठिनाई का सामना न करना पड़े। उनके ठहरने, भोजन और पेयजल की सुविधाओं के साथ कार्यक्रमों को देखने के लिए एलईडी स्क्रीन भी लगाई गईं। इसके अतिरिक्त, दिव्यांग श्रद्धालुओं को सतगुरु के पावन दर्शन का लाभ भी प्राप्त हुआ। इन व्यवस्थाओं ने आयोजन में समावेशिता और सेवा के महत्व को रेखांकित किया। किसी भी आध्यात्मिक आयोजन की सार्थकता तभी बढ़ती है, जब उसमें प्रत्येक श्रद्धालु की सुविधा, गरिमा और सहभागिता का ध्यान रखा जाए।

स्वास्थ्य सेवाओं का व्यापक प्रबंध, 120 बिस्तरों वाले अस्थायी अस्पताल की व्यवस्था

79वें निरंकारी संत समागम में श्रद्धालुओं के स्वास्थ्य और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए मिशन के स्वास्थ्य एवं समाज कल्याण विभाग की ओर से व्यापक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं। परिसर में 8 एलोपैथिक और 6 होम्योपैथिक डिस्पेंसरी तथा 15 प्राथमिक चिकित्सा केंद्र स्थापित किए गए। इसके अलावा 15 आईसीयू सुविधाओं से युक्त 120 बिस्तरों वाला अस्थायी अस्पताल भी बनाया गया। आपातकालीन परिस्थितियों से निपटने के लिए मिशन की 12 एम्बुलेंस और हरियाणा सरकार की 30 एम्बुलेंस की व्यवस्था की गई, जिनमें 15 एम्बुलेंस वेंटिलेटर युक्त थीं। इतने बड़े आयोजन में चिकित्सा सुविधाओं का यह विस्तृत प्रबंध श्रद्धालुओं को समय पर सहायता उपलब्ध कराने की तैयारी को दर्शाता है।

कायरोप्रैक्टिक शिविर में देश-विदेश के विशेषज्ञ चिकित्सकों ने दी सेवाएं

समागम परिसर में आयोजित कायरोप्रैक्टिक शिविर में भारत और विदेशों से आए विशेषज्ञ चिकित्सकों ने अपनी सेवाएं प्रदान कीं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस शिविर में हजारों लोगों को उपचार और स्वास्थ्य संबंधी सहायता से लाभ मिला। इसके साथ ही ईएनटी, नेत्र रोग, बाल रोग, दंत चिकित्सा और मनोरोग सहित विभिन्न चिकित्सा क्षेत्रों के वरिष्ठ विशेषज्ञों की टीम ने श्रद्धालुओं को स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराईं। चिकित्सा शिविरों के माध्यम से बड़ी संख्या में लोगों तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने का प्रयास किया गया। इस पहल ने सेवा के उस मानवीय स्वरूप को सामने रखा, जिसमें जरूरतमंदों की सहायता को प्राथमिकता दी जाती है।

चार स्थानों पर लंगर, 22 कैंटीनों के माध्यम से श्रद्धालुओं को सुविधाएं

79वें निरंकारी संत समागम में भोजन और जलपान की व्यवस्था भी व्यापक स्तर पर की गई। परिसर में चार स्थानों पर सामुदायिक लंगर की व्यवस्था रही, जहां लाखों श्रद्धालुओं को दिन-रात भोजन उपलब्ध कराया गया। सभी वर्गों के लोगों को एक साथ बैठकर लंगर ग्रहण करते देख समानता, सहयोग और ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की भावना का संदेश सामने आया। इसके अतिरिक्त, 22 कैंटीनों में रियायती दरों पर अल्पाहार, चाय, कॉफी और मिनरल वाटर उपलब्ध कराया गया। इतने विशाल आयोजन में भोजन और जलपान की व्यवस्थाएं श्रद्धालुओं की सुविधा के साथ-साथ सामूहिक सेवा और सहभागिता के महत्व को भी उजागर करती हैं।

प्रेम, सेवा और मानवता का संदेश बना समागम की प्रमुख पहचान

समालखा में आयोजित 79वें वार्षिक निरंकारी संत समागम का तीसरा दिन आध्यात्मिक संदेशों के साथ सेवा, स्वास्थ्य, समानता और मानवीय संवेदनाओं के महत्व को भी सामने लाया। सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज और निरंकारी राजपिता रमित जी के प्रवचनों ने श्रद्धालुओं को परमात्मा के प्रति प्रेम, आत्मनिरीक्षण, सकारात्मक सोच और अहंकार से दूर रहने की प्रेरणा दी। वहीं, दिव्यांग श्रद्धालुओं के लिए विशेष सुविधाएं, व्यापक चिकित्सा सेवाएं और सामुदायिक लंगर जैसी व्यवस्थाओं ने सेवा भावना को व्यवहार में उतारने का उदाहरण प्रस्तुत किया। समागम का केंद्रीय संदेश यही रहा कि सच्ची आध्यात्मिक जागृति वही है, जो मनुष्य के विचारों और व्यवहार में प्रेम, करुणा, विनम्रता और विश्वबंधुत्व के रूप में दिखाई दे।

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