By विनय मिश्रा नई दिल्ली : दिनांक 05 अक्टूबर 2026, संत निरंकारी मिशन का 79वां वार्षिक संत समागम 23 से 26 अक्टूबर 2026 तक समालखा स्थित संत निरंकारी आध्यात्मिक स्थल पर भव्य स्वरूप में आयोजित किया जाएगा। चार दिनों तक चलने वाला यह आध्यात्मिक आयोजन केवल श्रद्धालुओं के एकत्र होने का अवसर नहीं, बल्कि सेवा, प्रेम, सद्भाव, मानव कल्याण और आध्यात्मिक जागृति का ऐसा संगम होगा, जहां देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु एकत्व और मानवता का संदेश आत्मसात करेंगे।
इस वर्ष के समागम की सबसे विशेष बात इसका प्रेरणादायी विषय ‘जागृति’ है। सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज एवं निरंकारी राजपिता रमित जी के पावन सान्निध्य में आयोजित होने वाला यह समागम श्रद्धालुओं को बाहरी दुनिया की भागदौड़ से हटकर अपने अंतर्मन में झांकने, आत्मिक चेतना को पहचानने और जीवन को प्रेम एवं प्रभु-भक्ति से जोड़ने की प्रेरणा देगा। समागम की घोषणा के साथ ही श्रद्धालुओं में उत्साह, उमंग और सेवा के प्रति नई ऊर्जा दिखाई दे रही है।
‘जागृति’ का संदेश केवल आध्यात्मिक शब्द नहीं, बल्कि जीवन को भीतर से बदलने वाली चेतना का आह्वान है। जब मनुष्य के अंतर्मन में प्रभु के प्रति जागृति आती है तो उसके विचारों, व्यवहार और जीवन की दिशा में सकारात्मक परिवर्तन दिखाई देने लगता है। सुमिरन मन को शांति देता है, सत्संग विचारों को दिशा देता है और सेवा जीवन को मानव कल्याण से जोड़ती है। इसी आत्मिक जागरण की भावना को केंद्र में रखकर इस वर्ष का संत समागम श्रद्धालुओं के लिए एक ऐसी आध्यात्मिक यात्रा बनने जा रहा है, जो आयोजन समाप्त होने के बाद भी उनके जीवन में प्रेरणा छोड़ जाएगी।
सेवा बनी समागम की सबसे बड़ी ताकत
समागम की तैयारियां इन दिनों पूरे उत्साह और निःस्वार्थ सेवा-भाव के साथ चल रही हैं। समागम स्थल पर सुबह की पहली किरण से लेकर शाम तक सेवकों की सक्रियता, अनुशासन और समर्पण सहज ही लोगों का ध्यान आकर्षित कर रहा है। यहां उम्र, सामाजिक पृष्ठभूमि और व्यक्तिगत पहचान की सीमाएं पीछे छूट जाती हैं और सभी का एक ही परिचय दिखाई देता है—सेवक।
कोई निर्माण कार्य में अपना योगदान दे रहा है, कोई विशाल शामियानों और पंडालों को व्यवस्थित करने में जुटा है, तो कोई स्वच्छता, पेयजल, भोजन और श्रद्धालुओं की सुविधा से जुड़ी व्यवस्थाओं को संभाल रहा है। समागम स्थल पर बन रहा भव्य मुख्य प्रवेश-द्वार भी आकर्षण का केंद्र बन रहा है। यह द्वार केवल आयोजन की भव्यता को प्रदर्शित करने वाला ढांचा नहीं, बल्कि प्रेम, समरसता और आध्यात्मिक एकत्व की ओर बढ़ते कदमों का प्रतीक माना जा रहा है।
समागम स्थल पर सेवा का दृश्य अपने आप में एक अलग कहानी बयां कर रहा है। यहां मेहनत करने वाले सेवकों के चेहरों पर थकान से अधिक संतोष और आत्मिक आनंद दिखाई देता है। कोई व्यवस्था संभाल रहा है तो कोई बिना किसी अपेक्षा के दूसरे श्रद्धालु की सुविधा सुनिश्चित करने में लगा है। यही निःस्वार्थ भावना इस आयोजन को महज एक बड़े धार्मिक कार्यक्रम से अलग पहचान देती है और सेवा को आध्यात्मिक साधना के रूप में सामने लाती है।
सेवा में दिखता है समर्पण का असली अर्थ
निरंकारी मिशन की परंपरा में सेवा को केवल जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रेम, कृतज्ञता और मानवता के प्रति समर्पण की अभिव्यक्ति के रूप में देखा जाता है। यही कारण है कि समागम की तैयारियों में शामिल सेवकों के लिए घंटों काम करना भी बोझ नहीं, बल्कि आनंद और आत्मिक संतुष्टि का माध्यम बन जाता है। सेवा करते हुए उनके चेहरे पर दिखाई देने वाली सहज मुस्कान इस बात को रेखांकित करती है कि सच्ची सेवा व्यक्ति को भीतर से समृद्ध करती है।
सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज भी अपने प्रवचनों में सेवा, सत्संग और प्रभु-स्मरण के महत्व पर निरंतर बल देती हैं। इसी भावना को व्यक्त करते हुए कहा गया है—
‘तन पवित्र सेवा किये, धन पवित्र दिये दान,
मन पवित्र हरि भजन सों, त्रिबिध होई कल्याण।’
इसका भावार्थ है कि जब तन सेवा में, धन परोपकार में और मन प्रभु-भक्ति में समर्पित होता है, तब जीवन सच्चे कल्याण और आत्मिक शांति की दिशा में आगे बढ़ता है। यही विचार इस वर्ष के ‘जागृति’ संदेश को और अधिक सार्थक बनाता है।
श्रद्धालुओं की सुविधा पर भी विशेष फोकस
समागम में देश के अलग-अलग क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना को देखते हुए उनकी सुविधा के लिए आवश्यक व्यवस्थाओं को व्यवस्थित रूप दिया जा रहा है। सेवा, सत्कार, स्वच्छता, भोजन, जल और आवागमन से जुड़ी व्यवस्थाओं को सुचारू बनाने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, ताकि दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं को सहज और सम्मानजनक वातावरण मिल सके।
समागम की तैयारियों में दिखाई दे रही व्यापकता यह बताती है कि आयोजन केवल मंच और कार्यक्रमों तक सीमित नहीं है। इसके पीछे बड़ी संख्या में सेवकों की मेहनत, योजना, अनुशासन और सामूहिक सहयोग जुड़ा हुआ है। यही सामूहिक प्रयास इस आयोजन को ‘सेवा से समागम’ और ‘समागम से संदेश’ की भावना प्रदान करता है।
चार दिन, एक संदेश—मानवता सबसे ऊपर
निःसंदेह, 79वां वार्षिक संत समागम केवल चार दिनों का धार्मिक या आध्यात्मिक आयोजन नहीं, बल्कि मानवता, प्रेम, शांति, समरसता और एकत्व का व्यापक संदेश देने वाला अवसर बनने जा रहा है। अलग-अलग संस्कृतियों, क्षेत्रों और सामाजिक परिवेश से आने वाले श्रद्धालु जब एक ही स्थल पर एक साथ बैठते हैं, सेवा करते हैं और सतगुरु की अमृतवाणी सुनते हैं, तो ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की भावना व्यवहार में दिखाई देती है।
समालखा की धरती पर 23 से 26 अक्टूबर तक होने वाला यह संत समागम ‘जागृति’ के संदेश के साथ श्रद्धालुओं को यह सोचने का अवसर देगा कि आध्यात्मिक जागृति केवल स्वयं के जीवन में परिवर्तन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज में प्रेम, सहयोग और मानवता को मजबूत करने की शक्ति भी है। सेवा की सुगंध, समर्पण की आभा और एकत्व की भावना से सजे इस दिव्य महापर्व में प्रत्येक भाई-बहन एवं सज्जन भक्त का हार्दिक स्वागत है।


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