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Fortis Manesar में Rectal Cancer Treatment का बड़ा Revolution! ALPI Tube Technology से Stage-3 Rectal Cancer का सफल इलाज, स्टोमा और दूसरी सर्जरी से मिली राहत!

By विनय मिश्रा नई दिल्लीमानेसर, 10 जून, 2026, कोलोरेक्टल कैंसर के उपचार में क्लीनिकल उत्कृष्टता का परिचय देते हुए फोर्टिस हॉस्पिटल, मानेसर देश का पहला अस्पताल बन गया है, जिसने स्टेज-III रेक्टल कैंसर से पीड़ित बांग्लादेश के 55 वर्षीय मरीज का इनोवेटिव एएलपीआई (ALPI) ट्यूब फीकल डायवर्जन सिस्टम की सहायता से सफल उपचार किया है।

Fortis Manesar में ALPI Tube Technology के जरिए Stage-3 Rectal Cancer मरीज की सफल रोबोटिक सर्जरी करते डॉक्टरों की टीम।

इस जटिल प्रक्रिया को फोर्टिस हॉस्पिटल, मानेसर के सीनियर डायरेक्टर – सर्जिकल ऑन्कोलॉजी डॉ. विनय सैमुअल गायकवाड़ के नेतृत्व में रोबोटिक-असिस्टेड कैंसर सर्जरी के माध्यम से नई तकनीक का उपयोग करते हुए सफलतापूर्वक अंजाम दिया गया।

मरीज मोयज्जम हुसैन पिछले लगभग पांच महीनों से लगातार मलाशय में दर्द (रेक्टल पेन) की समस्या से पीड़ित थे। अपने देश में उन्नत उपचार सुविधाएं उपलब्ध न होने के कारण वे इलाज के लिए भारत आए और फोर्टिस मानेसर में विशेषज्ञों से परामर्श लिया। रक्त जांच, ट्यूमर मार्कर टेस्ट तथा पीईटी-सीटी (PET-CT) स्कैन सहित विस्तृत जांचों में लगभग 13 सेंटीमीटर आकार के रेक्टम ट्यूमर की पुष्टि हुई, जिसने आसपास के कई ऊतकों को भी प्रभावित कर दिया था। जांच में मरीज के स्टेज-III कोलोरेक्टल कैंसर से पीड़ित होने की पुष्टि हुई।

Fortis Manesar द्वारा ALPI Tube Technology से Stage-3 Rectal Cancer का सफल उपचार, जिससे मरीज को स्टोमा और दूसरी सर्जरी से राहत मिली।

आमतौर पर निचले मलाशय के कैंसर की सर्जरी कराने वाले मरीजों को ऑपरेशन के बाद अस्थायी स्टोमा (पेट में बनाई जाने वाली कृत्रिम ओपनिंग) की आवश्यकता होती है, ताकि सर्जिकल साइट के ठीक होने तक मल को उस हिस्से से दूर रखा जा सके। हालांकि स्टोमा एनेस्टोमोटिक लीकेज के खतरे को कम करता है, लेकिन यह मरीज के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक जीवन पर गहरा प्रभाव डालता है तथा बाद में इसे हटाने के लिए अलग से रिवर्सल सर्जरी भी करनी पड़ती है।

इस मामले में डॉ. विनय गायकवाड़ और उनकी टीम ने सर्जरी के दौरान आंत में एएलपीआई ट्यूब लगाई। इस डिवाइस ने फीकल मैटर (मल) को नए बनाए गए कोलोरेक्टल जंक्शन से दूर रखा, जिससे सर्जिकल साइट सुरक्षित रही और बाहरी स्टोमा लगाने की आवश्यकता नहीं पड़ी। इससे मरीज को स्टोमा से जुड़ी असुविधाओं और जीवनशैली संबंधी परेशानियों से राहत मिली तथा अलग से रिवर्सल सर्जरी की जरूरत भी समाप्त हो गई।

करीब छह घंटे चली इस सर्जरी में ट्यूमर और प्रभावित ऊतकों को हटाने के बाद आंत का पुनर्निर्माण (रीकंस्ट्रक्शन) किया गया और एएलपीआई ट्यूब लगाई गई। सफल रिकवरी के बाद मरीज को केवल छह दिन में अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।

इस उपलब्धि पर डॉ. विनय सैमुअल गायकवाड़ ने कहा, “कई दशकों से निचले मलाशय के कैंसर की सर्जरी के बाद अस्थायी स्टोमा को मानक उपचार माना जाता रहा है। हालांकि यह चिकित्सकीय रूप से प्रभावी है, लेकिन मरीजों के लिए मानसिक, सामाजिक और शारीरिक रूप से चुनौतीपूर्ण होता है। सावधानीपूर्वक चुने गए मामलों में एएलपीआई ट्यूब एक प्रभावी विकल्प के रूप में सामने आई है, जो आंतरिक स्तर पर फीकल डायवर्जन कर मरीज को अधिक सहूलियत और सम्मान प्रदान करती है। इससे रिकवरी बेहतर होती है, स्टोमा संबंधी जटिलताएं कम होती हैं और रिवर्सल सर्जरी की आवश्यकता भी नहीं पड़ती।”

उन्होंने आगे कहा, “यदि इस मरीज का समय पर उपचार नहीं किया जाता, तो ट्यूमर और फैल सकता था, जिससे आंत पूरी तरह अवरुद्ध होने, पोषण की गंभीर कमी, अत्यधिक कमजोरी और अन्य जीवन-घातक जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता।”

फोर्टिस हॉस्पिटल, मानेसर के फैसिलिटी डायरेक्टर अभिजीत सिंह ने कहा, “हमारा उद्देश्य केवल बीमारी का इलाज करना नहीं, बल्कि मरीजों के जीवन की गुणवत्ता में भी सुधार लाना है। एएलपीआई ट्यूब फीकल डायवर्जन सिस्टम अस्थायी स्टोमा की तुलना में अधिक सुरक्षित और आरामदायक विकल्प के रूप में उभरकर सामने आया है। देश में इस इनोवेटिव तकनीक का सफल उपयोग करने वाला पहला अस्पताल बनना हमारी क्लीनिकल उत्कृष्टता, नवाचार और मरीज-केंद्रित देखभाल के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है।”

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