By अशोक कुमार निर्भय नई दिल्ली : भारत में तपेदिक (टीबी) आज भी एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बनी हुई है। यह विडंबना ही है कि एक ओर यह रोग पूरी तरह से रोके जाने और ठीक होने योग्य है, वहीं दूसरी ओर हर वर्ष लाखों लोग इससे प्रभावित होते हैं। समस्या का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि बड़ी संख्या में मरीज समय पर पहचान में नहीं आ पाते। यही “छूटे हुए मरीज” टीबी के प्रसार की सबसे बड़ी कड़ी हैं।
भारत का टीबी मुक्त अभियान, विशेष रूप से हमारे माननीय प्रधानमंत्री स्तर पर मजबूत राजनीतिक प्रतिबद्धता के कारण, देश से टीबी उन्मूलन की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण प्रगति लेकर आया है, जो अन्य देशों की तुलना में कहीं अधिक तेज़ है।
भारत में टीबी की घटना दर (हर वर्ष सामने आने वाले नए मामले) में 21% की कमी आई है—जो 2015 में प्रति लाख जनसंख्या 237 से घटकर 2024 में 187 प्रति लाख रह गई है। यह गिरावट वैश्विक स्तर पर देखी गई 12% की कमी की तुलना में लगभग दोगुनी गति से हुई है, जैसा कि डब्ल्यू एच ओ की रिपोर्ट में बताया गया है। इसके साथ ही, देश में उपचार कवरेज भी उल्लेखनीय रूप से बढ़कर 2024 में 92% से अधिक हो गया है, जो 2015 में केवल 53% था
राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम (NTEP) के तहत पिछले कुछ वर्षों में जांच और उपचार सुविधाओं का उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। आधुनिक तकनीकों का उपयोग, निःशुल्क उपचार और बेहतर निगरानी व्यवस्था ने टीबी नियंत्रण को मजबूती दी है। फिर भी केवल मरीजों के स्वयं स्वास्थ्य संस्थानों तक पहुंचने पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। सामाजिक कलंक, जागरूकता की कमी और स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच के कारण कई मरीज देर से सामने आते हैं, जिससे संक्रमण का चक्र जारी रहता है।
इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए 100-दिवसीय सक्रिय टीबी जांच अभियान एक महत्वपूर्ण रणनीतिक बदलाव के रूप में उभरा है। इस पहल के तहत स्वास्थ्य सेवाओं को समुदाय के करीब ले जाया जा रहा है। घर-घर जाकर स्क्रीनिंग, मोबाइल एक्स-रे यूनिट्स और विशेष रूप से चिन्हित उच्च जोखिम समूहों पर ध्यान केंद्रित करने से मरीजों की पहचान में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला है।
विशेष रूप से मधुमेह, एचआईवी/एड्स से ग्रस्त व्यक्ति, बुजुर्ग तथा घनी आबादी वाले क्षेत्रों में रहने वाले लोग टीबी के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। इन समूहों में सक्रिय जांच से न केवल मरीजों की जल्दी पहचान होती है, बल्कि संक्रमण के फैलाव को भी प्रभावी ढंग से रोका जा सकता है।
तकनीकी प्रगति ने भी इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। डिजिटल एक्स-रे और CBNAAT जैसी आधुनिक जांच विधियों ने टीबी की पहचान को तेज और सटीक बनाया है, जिससे समय पर उपचार संभव हो पा रहा है।
*हालांकि, यह आवश्यक है कि ऐसे अभियानों को केवल सीमित अवधि तक चलाने के बजाय नियमित स्वास्थ्य सेवाओं का अभिन्न हिस्सा बनाया जाए।* जब तक सक्रिय जांच को स्वास्थ्य प्रणाली में स्थायी रूप से शामिल नहीं किया जाएगा, तब तक अपेक्षित दीर्घकालिक परिणाम प्राप्त करना कठिन होगा।
भारत ने वर्ष 2025 तक टीबी उन्मूलन का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए आवश्यक है कि हम केवल उपचार पर नहीं, बल्कि समय पर पहचान पर भी समान रूप से ध्यान दें।
विश्व टीबी दिवस के अवसर पर यह संदेश स्पष्ट है — *यदि हमें टीबी को समाप्त करना है, तो हमें छूटे हुए मरीजों को खोजकर उन्हें समय पर उपचार देना होगा। यही इस लड़ाई की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है।*

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