By विनय मिश्रा नई दिल्ली: वीएमएमसी एवं सफदरजंग अस्पताल ने अपने रीनल ट्रांसप्लांट कार्यक्रम में एक बड़ा कीर्तिमान स्थापित किया है। अस्पताल में पहली बार सफल बाल चिकित्सा किडनी प्रत्यारोपण (Paediatric Renal Transplant) किया गया है। यह उपलब्धि न केवल सफदरजंग अस्पताल के लिए ऐतिहासिक है, बल्कि यह देश के किसी भी केंद्रीय सरकारी अस्पताल में किया गया पहला बालक किडनी ट्रांसप्लांट है।
अस्पताल के निदेशक डॉ. संदीप बंसल ने जानकारी दी कि यह उपलब्धि संस्थान के डॉक्टरों की दक्षता, टीमवर्क और उन्नत चिकित्सा सुविधाओं का प्रमाण है।
ट्रांसप्लांट टीम:
सर्जिकल ट्रांसप्लांट टीम का नेतृत्व
डायरेक्टर प्रोफेसर एवं हेड — यूरोलॉजी व रीनल ट्रांसप्लांट, डॉ. पवन वासुदेवा
ने किया। उनकी टीम में डॉ. निरज कुमार, प्रोफेसर यूरोलॉजी शामिल थे।
बाल नेफ्रोलॉजी टीम का नेतृत्व:
डायरेक्टर प्रोफेसर व इंचार्ज — पीडियाट्रिक नेफ्रोलॉजी, डॉ. शोभा शर्मा
ने किया। टीम में डॉ. श्रीनिवासवरदन, असिस्टेंट प्रोफेसर शामिल थे।
एनेस्थीसिया टीम का नेतृत्व:
डॉ. सुशील ने किया। टीम में डॉ. ममता और डॉ. सोनाली शामिल थीं, जिनका मार्गदर्शन
डायरेक्टर प्रोफेसर व हेड — एनेस्थीसिया, डॉ. कविता रानी शर्मा
ने किया।
11 वर्षीय बच्चे की जान बची:
मरीज 11 वर्ष का एक बच्चा था, जिसे दुर्लभ बीमारी — बाइलेट्रल हाइपोडिसप्लास्टिक किडनी के कारण एंड स्टेज किडनी डिजीज हो गई थी। करीब डेढ़ वर्ष पहले गंभीर हालत में अस्पताल लाया गया था और कार्डियक अरेस्ट के बाद उसे पुनर्जीवित किया गया। तब से वह नियमित डायलिसिस पर था।
मां ने दी किडनी:
सर्जरी में बच्चे की 35 वर्षीय मां ने किडनी दान की।
डॉ. पवन वासुदेवा ने बताया कि बाल चिकित्सा किडनी प्रत्यारोपण वयस्क ट्रांसप्लांट से अधिक जटिल होता है, क्योंकि—
बच्चे की छोटी नसों में बड़े वेसल्स से कनेक्शन (anastomosis) करना पड़ता है
बच्चे के शरीर में वयस्क किडनी के लिए पर्याप्त जगह बनानी पड़ती है
उन्होंने खुशी जताई कि किडनी पूरी तरह काम कर रही है, बच्चा डायलिसिस से मुक्त है और जल्द ही डिस्चार्ज किया जाएगा।
मुफ्त इलाज से एक मजदूर परिवार का सपना पूरा:
डायरेक्टर डॉ. संदीप बंसल ने कहा कि सफदरजंग अस्पताल बिना किसी भेदभाव के नागरिकों को उच्च गुणवत्ता की स्वास्थ्य सेवाएँ निःशुल्क उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है। सुल्तानपुर (उत्तर प्रदेश) के मजदूर परिवार के इस बच्चे के लिए यह सर्जरी निजी अस्पतालों में लगभग 15 लाख रुपये की लागत वाली होती।
डॉ. चारु बाम्बा, मेडिकल सुपरिंटेंडेंट ने बताया कि अस्पताल बच्चे को महंगे इम्यूनोसप्रेसिव दवाएं भी निःशुल्क उपलब्ध कराएगा, जिनका जीवनभर सेवन जरूरी है।


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